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जिंदगी से इतनी मुहब्बत तो न थी

जिंदगी से इतनी मुहब्बत तो ना थी यूँ डर के जीने की आदत तो ना थी  थी फ़ज़ाये मेरे दिल सी वीरान हर गली हर मकान किसी के आने की आहट तो ना थी मिले कभी तो दो ही पल सुकून के थे माना सिलसिले अपने जुनून के उम्र भर की तुमसे राहत तो न थी कुछ तो पुराना था अपना शायद हम मिले थे पहले कहीं शायद इतनी नई नई ये चाहत तो न थी चल रहे थे तन्हा आँख मींचकर  वो देख रहा था राह में छुपकर  हर पल की ये सोहबत तो न थी