एक कुर्ते की कहानी
कुछ समय से मेरे दिमाग में एक सफेद रंग का कुर्ता सिलवाने का ख़्याल चल रहा था यूं तो मेरे पास सिले सिलाए बहुत से कुर्ते पहले से मौजूद थे जिनमें से ज़्यादातर सफेद ही थे पर ना जाने क्यों अचानक एक कुर्ता खुद से सिलवाकर पहनने का मन हुआ। मैने अपने एक जानने वाले दर्जी से इसके बारे में पूछा तो उसने बताया कि फलां दुकान से कपड़ा ले आओ मैं सिल कर दे दूंगा। ये जानकर मुझे थोड़ी तसल्ली हुई की चलो आज के वक्त में भी कपड़े इस आसानी से सिलवाए जा सकते है । खैर मुझे तीन चार रोज़ तक तो समय नहीं मिला लेकिन एक रोज़ मैं जैसे ही उस मेरे जानने वाले दर्जी की दुकान से गुज़र रहा था तो मैंने देखा कि एक अधेड़ उम्र की औरत दुकान के बाहर खड़ी हुई उससे जिरह कर रही है उसकी कुछ शिकायतें थी उन कपड़ों को लेकर जो उसने वहां सिलवाए थे और मैंने ये भी देखा की मेरा जानने वाला दर्जी बड़ी आराम से और खुद पर एक अजीब तरह का यकीन रखे हुए उसकी बातों का जवाब दे रहा है। मेरे ज़हन में उस वक्त दो बातें आई, पहली तो ये की सिर्फ कपड़ा सिलना जानने से कोई दर्जी नही हो जाता, कपड़े सिलने के बाद दर्जी की थोड़ी जिम्मेदारी ये भी हो जाती है की ग्राहक क...