एक कुर्ते की कहानी

कुछ समय से मेरे दिमाग में एक सफेद रंग का कुर्ता सिलवाने का ख़्याल चल रहा था यूं तो मेरे पास सिले सिलाए बहुत से कुर्ते पहले से मौजूद थे जिनमें से ज़्यादातर सफेद ही थे पर ना जाने क्यों अचानक एक कुर्ता खुद से सिलवाकर पहनने का मन हुआ।
मैने अपने एक जानने वाले दर्जी से इसके बारे में पूछा तो उसने बताया कि फलां दुकान से कपड़ा ले आओ मैं सिल कर दे दूंगा। ये जानकर मुझे थोड़ी तसल्ली हुई की चलो आज के वक्त में भी कपड़े इस आसानी से सिलवाए जा सकते है । खैर मुझे तीन चार रोज़ तक तो समय नहीं मिला लेकिन एक रोज़ मैं जैसे ही उस मेरे जानने वाले दर्जी की दुकान से गुज़र रहा था तो मैंने देखा कि एक अधेड़ उम्र की औरत दुकान के बाहर खड़ी हुई उससे जिरह कर रही है उसकी कुछ शिकायतें थी उन कपड़ों को लेकर जो उसने वहां सिलवाए थे और मैंने ये भी देखा की मेरा जानने वाला दर्जी बड़ी आराम से और खुद पर एक अजीब तरह का यकीन रखे हुए उसकी बातों का जवाब दे रहा है।
मेरे ज़हन में उस वक्त दो बातें आई, पहली तो ये की सिर्फ कपड़ा सिलना जानने से कोई दर्जी नही हो जाता, कपड़े सिलने के बाद दर्जी की थोड़ी जिम्मेदारी ये भी हो जाती है की ग्राहक को उसे ये भी महसूस करवाना है की उसे वैसी ही चीज मिली है जैसी उसने चाही थी।
और दूसरा खयाल मुझे ये आया की ये जो मेरा जानने वाला दर्जी है ये सिर्फ़ औरतों के कपड़े सिलता है, क्योंकि जब मैने इस वाकये के बाद ज़रा अपने ज़हन पर ज़ोर डालकर सोचा तो मुझे कभी भी कोई मर्द उसकी दुकान पर खड़ा हुआ नजर नहीं आया जबकि मेरा उसकी दुकान के सामने से रोज़ का आना जाना था। जब मेरा ये भ्रम टूटा तो मैने फैसला किया की अब में चौक वाली दुकान पर कुर्ता सिलवाने को दूंगा उस दुकान में दो दर्जी काम करते है और उस दुकान पर आज तक मैंने किसी औरत को खड़े हुए नही देखा।
एक रोज दफ्तर से ज़रा जल्दी छूटने के बाद मैं अपने जानने वाले दर्जी की बताई हुई दुकान पर पहुंचा और वहां चार पांच अलग अलग किस्म के कपड़े देखकर एक कपड़ा कुर्ते के लिए चुना और खरीद लिया। उसके बाद मैं वो कपड़ा लेकर चौक वाली दुकान पर पहुंचा और वहां दर्जी से बात की। उसने सबसे पहला सवाल ये किया कि मैने कपड़ा कहां से खरीदा। मैने दुकानदार का नाम बताया तो उसने अपने असिस्टेंट की तरफ देखकर कहा कि ये दुकान वाला कपड़ा बहुत महंगा बेचता है फिर उसने मेरा नाप लेना शुरू किया कंधो का, गर्दन का, कलाइयों का, साथ साथ ये भी पूछता रहा की कॉलर चाहिए क्या, फुल बाजू की हाफ बाजू। मैने कॉलर के लिए मना किया और फुल बाज़ू के लिए हामी भरी। नाप हो गया और उसने मुझे एक पर्ची काटकर दे दी कि तीन या चार रोज़ बाद आना और ये पर्ची दिखाकर कुर्ता ले जाना मैने पैसों के बारे में पूछा तो उसने कहा की जब कुर्ता लेने आओगे तब ही दे देना।
पैसे और दिन पर्ची पर लिखे थे।
मैं तय दिन से एक दिन बाद दुकान पर पहुंचा पर्ची दिखाई तो उन्हें कुछ याद आया और उन्होंने कहा की ठीक है आप कल सुबह ले जाइए उसमें कुछ ज़रा सा काम अभी बाकी है। मैं वापस आ गया।
अगले दिन सुबह पहुंचा तो कुर्ता तैयार था मैंने पेमैंट किया और कुर्ता लेकर आ गया । घर पहुंचकर उसको पहन कर देखा तो पहनते ही वो एकदम मेरे शरीर से चिपक गया। पहनते वक्त भी बड़ी मुश्किल हुई, कंधो से नीचे ना उतरे, कुछ देर आंखो के आगे अंधेरा छा जाए। मैने सोचा ऐसे कैसे काम चलेगा।
वापस दुकान पर जाने का मन नहीं हुआ।
फिर एक दिन मन बनाकर मैं दुकान पर पहुंचा और दर्जी से बात की। तो उसके असिस्टेंट ने कहा कि कुर्ते को एक बार धो लोगे तो कपड़ा थोड़ा नरम हो जायेगा और थोड़ा फैलेगा भी। मुझे थोड़ा इत्मीनान हुआ की चलो थोड़ा भी लूज़ होगा तो काम चल जाएगा। 
मैने वापस आकर उसे धोया सुखाया इस्तरी किया और अगले दिन पहना, पहनने में मुश्किल तो हुई पर पहनकर थोड़ा ठीक लगा। मैने वो उस दिन पूरा दिन पहने रखा। दफ्तर गया उसे पहने पहने सब काम काज किया। वैसे तो ठीक लग रहा था पर जब मैं अपने हाथ हिलाता डुलाता था तो ऐसा लगता था जैसे किसी ने जकड़ रखे है।
मैं पूरा दिन खुद को ये समझाता रहा कि ऐसे ही काम चल जाएगा मेरा ऐसा काम भी नहीं है जो बिना पूरी बाजुएं खोले हो नही सकता, मैं पहले से ही इतना समय इसे बनवाने में खपा चुका हूं और फिर मुझे ये भी पता था कि अगर मैं दर्जी से इसमें कुछ बदलाव करने को कहूंगा तो ये कहीं और अजीब ना हो जाए । इस डर और कश्मकश की वजह से मैंने खुद को ही समझा लेना ठीक समझा।
पर जब उस दिन मैंने वापस आकर वो कुर्ता उतारा तो मुझे ये एहसास हुआ कि अब इस के बाद मैं इसे एक पल के लिए भी नहीं पहन सकता। अब चाहे इसका जो हो। पैसे गए तो गए, मेहनत गई तो गई। मैं इसे पहनकर खुद पर अब और ज़ुल्म नहीं कर सकता सो मैंने उसे उठाकर एक तरफ रख दिया और कुछ रोज़ के लिए उस पूरे वाकये के बारे में भूल गया।
फिर एक दिन अचानक मुझे ये खयाल आया कि एक बार इसको दर्जी के पास ले जाकर देखता हूं। कुछ हो सकेगा तो हो जायेगा। एक कोशिश करने में क्या बुराई है। मैं कुर्ते को लेकर दर्जी के यहां पहुंचा और अपना और कुर्ते का दोनो का हाल सुनाया। मैने उससे कहा कि इसको जितना हो सके उतना ढीला कर दीजिए मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी लेकिन इतना चुस्त कुर्ता मुझसे हरगिज़ नहीं पहना जाएगा। दर्जी ने मेरी बात को ध्यान से सुना कुर्ता लिया और एक बार फिर मेरा नाप लेने लगा साथ में ये भी पूछता रहा की इतना लूज़ काफी है, कॉलर चाहिए या नहीं। इस बार मैंने कॉलर के लिए हामी भर दी। नाप लेने के बाद दर्जी ने कहा कि आप दो दिन बाद आ जाइएगा जो आपने कहा है हो जाएगा।
मैं कुर्ता देकर वापस आ गया।
ज़हन में ये ख्याल घूम रहा था कि अब वो कुर्ते के साथ करेगा क्या। कंधो पर से ढीला करेगा या सीने पर से और करेगा कैसे। कुर्ते में कपड़ा है कहां की वो ढीला होगा, उतना ही कपड़ा है जितनी की सिलाई। खैर मैंने सोचा की शायद कोई ऐसी तरकीब ज़रूर होगी जो सिर्फ दर्जियों को पता है और मैं नहीं जानता।
दो दिन बाद मैं दुकान पर पहुंचा तो मास्टर दर्जी गायब थे सिर्फ असिस्टेंट वहां मौजूद था मेरे पूछने पर उसने जवाब दिया कि कल आ जाइए वो अभी कहीं गए हुए है।
मैं अगली शाम दुकान पर पहुंचा तो फिर से वहां सिर्फ असिस्टेंट मौजूद था पूछने पर उसने बताया कि मास्टर अभी नमाज़ पढ़ने गए है आप बाद में आ जाइएगा कुर्ता आपका वो ही देंगे। मैं वापस आ गया।
अगले दिन फिर मैं शाम के वक्त दुकान पर पहुंचा तो उस दिन भी मास्टर साहब नहीं थे असिस्टेंट ने बताया कि पास ही में कोई फौत हो गए है वहीं गए है पता नहीं कब तक आएंगे आप कल आ जाना। मैं फिर वापस आ गया।
अगले दिन जब मैं दुकान पर पहुंचा तो मास्टर साहब मौजूद थे मैंने उनसे कुर्ते के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा देखो भई अगर मैं उस कुर्ते की जगह आपको दूसरा कुर्ता दे दूं तो क्या आपको चलेगा। मैने उनसे कुर्ता दिखाने को कहा तो उन्होंने मुझे एक बहुत ढीला चोगे जैसा कुर्ता दिखाया। रंग उसका सफेद थे कपड़ा हालांकि अलग था।
मैंने उसे वहीं उनकी दुकान पर ही पहन कर देखा। वो घुटनो तक का ढीला ढाला कुर्ता मुझे बहुत पसंद आया।
मैं उन से वो कुर्ता लेकर चुपचाप अपने घर की ओर चल दिया। 
कुछ दूर चलकर मुझे ख्याल आया की मैने उनसे ये भी नहीं पूछा कि मेरे वाले कुर्ते का क्या हुआ।

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