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Showing posts from October, 2024

रात होगी तो...

रात होगी तो जा सितारों से मिलूंगा दिन भर मैं सबसे अच्छे से मिलूंगा अभी तुम मुझे ढूँढने निकले तो हो  पर मैं तुम्हें लौटने पर तुम्हारे मिलूंगा मैं हूँ बुरे में भी जैसे कि हूँ अच्छे में  चाहोगे जैसे भी मुझे मैं वैसे मिलूंगा मेरा पता पूछते कोई आयेगा मुझ तक तो मैं उसे उस के पते पर से मिलूंगा।

बेवजह

चलो तुम्हारे लिए बहारों को बुलाते है खुद को भी हम थोड़ा आज़माते है सोच समझ कर आना जो आना इधर यहाँ आने वाले यहीं के हो जाते है दर्द चला नहीं जाता कहीं छोड़ हमें  बस हम दर्द के हमनवा हो जाते है कुछ घटता है बाहर तो कुछ घटे भीतर भी कहीं से चलते है हम कहीं निकल जाते है बेवजह शायर क्यों बने फिरते हो अतुल यूँ इस तरह भी कहीं लोगों को सताते है

कुछ ऐसी फितरत पाई

ज़िंदगी भर अपने चाहने वालो को किया नाशाद  क़ुदरतन कुछ ऐसी फितरत पाई हमने ।

दोपहरी

निचाट दोपहरी में अब कहाँ जाया जाए चलो बन फकीर सड़को पर आया जाए ठोकरें खाई जाए गली कूचो में दर बदर कुछ इस तरह अपना हाल सुनाया जाए लहू की कोई जुंबिश नहीं इन रगो में कहीं जान मगर सलामत है जशन मनाया जाए बड़ी उदास सी है ये दोपहरी आज चलो ना गलियों में मीर और ग़ालिब को गाया जाए बहुत से इंसान है यहाँ ग़म के मारे हुए अतुल कोई मसीहा इनकी खातिर बुलाया जाए

सवाल शायद वही है...

इतना मुश्किल तो ये सवाल जवाब नहीं  जवाब नही पता तो कह दो जवाब नहीं  वो शायद सही हो जिसे नहीं पता रास्ते का भटकाने वाले की रहनुमाई का जवाब नहीं  मुहब्बत भी करनी है और बा-ख़ुद भी रहना है ऐसी बातों का तो कोई भला-सा जवाब नहीं  मैं उसे देखता हूँ और वो मुझे देखता है कब से  सवाल शायद वही है जिसका कोई जवाब नहीं  रास्ता खैर इतना तो तय कर लिया तुमने भाई सवाल तो सही हुआ क्या हुआ जो जवाब नहीं

इबादत

विरह में चैन किसने पाया  ये दिल आखिर क्यों बनाया तेरे आगे झुक गया दिल खाली हो गया तुझमें एक अरसे तक मेरा खुदा रहा मेरे दर्द का हिसाब महज़ ना मेरे आंसुओं से करो शदीद दर्द वो भी थे जब जब मैं रोया नहीं ज़िक्र करो तो करो उस नूर का  आराम पहुँचे हमें भी तुम्हें भी 

कैफियत

कैफियत मुझ सी ना माँग सब कुछ चला जाएगा  कितना हसीन ख्याल है मेरा होना आपका होना  यूं तो खुशी भी गवारा है दिल को मगर गम पर ज़रा भरोसा कुछ ज्यादा ठहरे है