बेवजह

चलो तुम्हारे लिए बहारों को बुलाते है
खुद को भी हम थोड़ा आज़माते है

सोच समझ कर आना जो आना इधर
यहाँ आने वाले यहीं के हो जाते है

दर्द चला नहीं जाता कहीं छोड़ हमें 
बस हम दर्द के हमनवा हो जाते है

कुछ घटता है बाहर तो कुछ घटे भीतर भी
कहीं से चलते है हम कहीं निकल जाते है

बेवजह शायर क्यों बने फिरते हो अतुल
यूँ इस तरह भी कहीं लोगों को सताते है

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