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Spirituality/"अध्यात्म"

The basic difference between a sane mind and a chaotic mind is the identification with the information. If a person somehow finds that he is not the information which he has, and the information and the one who acces this information is different, then self can be detached from the information by constant practice of being aware of your ongoing thoughts even in the most difficult situation you face in daily life with your friends and colleagues. अगर कोई इंसान किसी तरह से ये जान ले कि वो और उसके विचार दो अलग अलग चीजें है, तो उसको एक रास्ता तो मिल ही जाता है आगे जाने का, अगर वो खुद को अपने विचारों के साथ identify नहीं करता तो धीरे-धीरे वो इस दिमाग की चलती हुई ट्रेन से अलग हो जाता है और सुकून महसूस करता है, जिसे खोज कहा गया है जो इंसान को लगातार परेशान करती है वो कुछ और नहीं ये विचारों का ही बदला हुआ रूप है जब आप विचारों से दूरी बना लेते है ( जो भी रास्ता आप अपनाए ) तब ये खोज भी खुद-ब-खुद खत्म हो जाती है या अगर ये रहती है तो भी आपको परेशान नहीं करती । ज़्यादातर ये देखा गया है कि ये खोज आप...

जिंदगी से इतनी मुहब्बत तो न थी

जिंदगी से इतनी मुहब्बत तो ना थी यूँ डर के जीने की आदत तो ना थी  थी फ़ज़ाये मेरे दिल सी वीरान हर गली हर मकान किसी के आने की आहट तो ना थी मिले कभी तो दो ही पल सुकून के थे माना सिलसिले अपने जुनून के उम्र भर की तुमसे राहत तो न थी कुछ तो पुराना था अपना शायद हम मिले थे पहले कहीं शायद इतनी नई नई ये चाहत तो न थी चल रहे थे तन्हा आँख मींचकर  वो देख रहा था राह में छुपकर  हर पल की ये सोहबत तो न थी

रात होगी तो...

रात होगी तो जा सितारों से मिलूंगा दिन भर मैं सबसे अच्छे से मिलूंगा अभी तुम मुझे ढूँढने निकले तो हो  पर मैं तुम्हें लौटने पर तुम्हारे मिलूंगा मैं हूँ बुरे में भी जैसे कि हूँ अच्छे में  चाहोगे जैसे भी मुझे मैं वैसे मिलूंगा मेरा पता पूछते कोई आयेगा मुझ तक तो मैं उसे उस के पते पर से मिलूंगा।

बेवजह

चलो तुम्हारे लिए बहारों को बुलाते है खुद को भी हम थोड़ा आज़माते है सोच समझ कर आना जो आना इधर यहाँ आने वाले यहीं के हो जाते है दर्द चला नहीं जाता कहीं छोड़ हमें  बस हम दर्द के हमनवा हो जाते है कुछ घटता है बाहर तो कुछ घटे भीतर भी कहीं से चलते है हम कहीं निकल जाते है बेवजह शायर क्यों बने फिरते हो अतुल यूँ इस तरह भी कहीं लोगों को सताते है

कुछ ऐसी फितरत पाई

ज़िंदगी भर अपने चाहने वालो को किया नाशाद  क़ुदरतन कुछ ऐसी फितरत पाई हमने ।

दोपहरी

निचाट दोपहरी में अब कहाँ जाया जाए चलो बन फकीर सड़को पर आया जाए ठोकरें खाई जाए गली कूचो में दर बदर कुछ इस तरह अपना हाल सुनाया जाए लहू की कोई जुंबिश नहीं इन रगो में कहीं जान मगर सलामत है जशन मनाया जाए बड़ी उदास सी है ये दोपहरी आज चलो ना गलियों में मीर और ग़ालिब को गाया जाए बहुत से इंसान है यहाँ ग़म के मारे हुए अतुल कोई मसीहा इनकी खातिर बुलाया जाए

सवाल शायद वही है...

इतना मुश्किल तो ये सवाल जवाब नहीं  जवाब नही पता तो कह दो जवाब नहीं  वो शायद सही हो जिसे नहीं पता रास्ते का भटकाने वाले की रहनुमाई का जवाब नहीं  मुहब्बत भी करनी है और बा-ख़ुद भी रहना है ऐसी बातों का तो कोई भला-सा जवाब नहीं  मैं उसे देखता हूँ और वो मुझे देखता है कब से  सवाल शायद वही है जिसका कोई जवाब नहीं  रास्ता खैर इतना तो तय कर लिया तुमने भाई सवाल तो सही हुआ क्या हुआ जो जवाब नहीं