दोपहरी

निचाट दोपहरी में अब कहाँ जाया जाए
चलो बन फकीर सड़को पर आया जाए

ठोकरें खाई जाए गली कूचो में दर बदर
कुछ इस तरह अपना हाल सुनाया जाए

लहू की कोई जुंबिश नहीं इन रगो में कहीं
जान मगर सलामत है जशन मनाया जाए

बड़ी उदास सी है ये दोपहरी आज चलो ना
गलियों में मीर और ग़ालिब को गाया जाए

बहुत से इंसान है यहाँ ग़म के मारे हुए अतुल
कोई मसीहा इनकी खातिर बुलाया जाए

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