रोज़ाना

 सीढ़ियाँ उतरकर मैं जैसे ही दाएं मुड़ा तो नौशाद टेलर, जो कि मेरी ही बिल्डिंग में तीसरे या चौथे माले पर रहता है अपनी दुकान में से ही बोला "अरे ओ भाई सुन, तुमने नल वल तो खुला नहीं छोड़ दिया था अपने यँहा, आज सुबह बिल्कुल पानी नहीं था मैंने जवाब में "नहीं" कहा और साथ में ये भी जोड़ दिया कि "हाँ वाक्य आज सुबह पानी की बहुत दिक्क़त थी"।मुर्गे और बकरे का ताज़ा गोश्त बेचने वाली दो आमने सामने की दुकानों को पार करते हुए मैंने चौक पर खड़े हुए एक ऑटो वाले से पूछा "चलोगे" तो उसने "ना" में सिर हिला दिया, आगे कुछ दूर चलकर दूसरे चौक पर खड़े ऑटो वाले से फिर पूछा तो उसने भी नहीं में जवाब दिया, तो मैंने सोचा कि चलो कुछ दूर और चलकर ऑटो ले लेंगे, चलते चलते लगा कि दस मिनट में अब तो पहुँच ही जाएँगे तो ऑटो क्या लें ।

अब घड़ी की दस मिनट ज़हन की कितनी मिनट होती है इसका ठीक अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है, दस मिनट में इतने चेहरे और घटनाएँ आँखों से गुज़रती है कि दस मिनट दस हज़ार मिनट और कभी कभी तो दस लाख मिनट लगती है आगे चौक पर चलकर एक चलती फिरती दुकान से तीन वडे वाली प्लेट लेकर नाश्ता किया, फिर चाय का उड़ा उड़ा सा ख्याल लेकर चाय की दुकान की ओर चल दिया, वँहा पहुँचकर एक चाय पी और फिर सड़क पार करके दफ्तर का रुख किया |

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